द्वाराहाट: पाली पछांऊ द्वाराहाट क्षेत्र का ऐतिहासिक स्याल्दे बिखौती मेला अपने दूसरे दिन मंगलवार को बटपुजै मेले के रूप में पूरे उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस दिन मेले में आस्था, परंपरा और वीरता का अद्भुत संगम देखने को मिला, जिसने हर किसी का मन मोह लिया। सदियों पुरानी परंपराओं को संजोए यह मेला आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है। बटपुजै मेले का मुख्य आकर्षण नौज्यूला धड़े के नौ जोड़ी नगाड़े-निशानों से जुड़े गांवों द्वारा ओड़ा भेंटने की प्राचीन रस्म रही। इस रस्म को बड़े जोश और श्रद्धा के साथ निभाया गया। ईड़ा, छतीना, बमनपुरी, सलालखोला, ध्याड़ी, हाट, कौंला, भुमकिया और तल्ली कहाली गांवों से बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक वेशभूषा में अपने वाद्य यंत्रों के साथ शामिल हुए।
ढोल, नगाड़े, मशकबीन, रणसिंघा और तुतुरी की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय और उत्सवमय हो उठा। गांवों के लोग वीर रस से ओतप्रोत ‘संरकार’ खेलते हुए आगे बढ़े, जो उनकी वीरता और एकजुटता का प्रतीक है। वहीं हुड़के और चिमटे की थाप पर झोड़ा-भगनौल गाते हुए लोग ओड़ा स्थल तक पहुंचे। यह दृश्य किसी सांस्कृतिक उत्सव से कम नहीं था, जहां हर कदम पर परंपरा की झलक दिखाई दे रही थी। ओड़ा स्थल पर पहुंचकर पारंपरिक विधि-विधान के साथ ओड़ा भेंटने की रस्म पूरी की गई। यह रस्म क्षेत्र की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी निभाया जा रहा है। मेले में शामिल लोगों ने इस आयोजन को न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक बताया।
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इस अवसर पर मेले का विधिवत उद्घाटन विधायक मदन सिंह बिष्ट और मेला समिति अध्यक्ष संगीता आर्या ने रानीखेत रोड पर रिबन काटकर किया। उद्घाटन समारोह में क्षेत्र के कई गणमान्य लोग भी उपस्थित रहे, जिनमें पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी, महेश नेगी, पूर्व प्रमुख दीपक किरौला, मेला समिति उपाध्यक्ष हेम रावत, सभासद रेखा देवी, नीतू देवी, निरंजन कुमार साह और हेम मठपाल शामिल थे। मेले में उमड़ी भारी भीड़ ने इस आयोजन की लोकप्रियता को दर्शाया। स्थानीय लोगों के साथ साथ दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं ने भी इस पारंपरिक उत्सव का भरपूर आनंद लिया। स्याल्दे बिखौती मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है। इस तरह बटपुजै मेले का दिन परंपरा, श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ, जिसने एक बार फिर साबित कर दिया कि हमारी संस्कृति और परंपराएं आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।
