द्वाराहाट(अल्मोड़ा)। द्वाराहाट को द्वारिका नगरी कहा जाना धार्मिक, पौराणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह नाम श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित उस दिव्य और समृद्ध नगरी से जुड़ाव दर्शाता है, जिसका इतिहास समुद्र में डूबने और वैज्ञानिक खोज के रहस्यों से भरा है। यह क्षेत्र भारतीय संस्कृति में धार्मिक श्रद्धा का केंद्र भी है और इसे भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति और उनके द्वारा बसाई गई नगरी के रूप में सम्मानित किया जाता है।
यदि आप द्वाराहाट के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास की गहराई में जाएं, तो यहां आपको मिलेगा कि द्वारिका नगरी का प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक महत्व इस क्षेत्र की पहचान का आधार है। इस प्रकार, द्वाराहाट को द्वारिका नगरी मानना एक ऐतिहासिक और धार्मिक विश्वास है जो श्रीकृष्ण की नगरी की महत्ता और उसकी विरासत को जीवित रखता है।
द्वाराहाट को द्वारिका नगरी क्यों कहा जाता है?
द्वाराहाट को द्वारिका नगरी कहे जाने के पीछे पौराणिक और ऐतिहासिक कारण हैं, जिनका संबंध भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ है। हिंदू धर्मग्रंथों और लोककथाओं के अनुसार, द्वारिका एक ऐसी दिव्य नगरी थी जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समय में समुद्र के किनारे बसाया था। इसकी प्रसिद्धि और महत्ता के कारण द्वाराहाट को भी द्वारिका नगरी कहा जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण और द्वारिका नगरी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़कर समुद्र के किनारे एक विशाल और समृद्ध नगर बसाने का निश्चय किया था, जिसे द्वारिका कहा गया। उन्होंने समुद्र देवता से भूमि मांगकर इस नगरी का निर्माण कराया। यह नगरी सोने जैसी भव्यता और वास्तुकला की वजह से “सोने की नगरी” के नाम से भी जानी जाती थी। यह नगरी शांति, सुरक्षा, संस्कृति और आध्यात्मिक समृद्धि का केंद्र थी।
द्वाराहाट और द्वारिका का नाम संबंध
द्वाराहाट क्षेत्र को लोककथाओं में द्वारिका नगरी कहा जाना उसके ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के कारण है। यहां यह विश्वास भी है कि द्वाराहाट क्षेत्र सदियों पहले द्वारिका नगरी के विस्तार या उससे जुड़े क्षेत्र हो सकता है। इसे श्रीकृष्ण की नगरी से जोड़कर इसका धार्मिक मान बढ़ जाता है।
समुद्र में डूबी नगरी का रहस्य
कहा जाता है कि कृष्ण के इस नश्वर संसार को छोड़ने के बाद द्वारिका नगरी समुद्र में डूब गई थी। आज भी समुद्र की गहराइयों में द्वारिका के अवशेष खोजे जा रहे हैं। यह नगर श्रीकृष्ण की कर्मभूमि के रूप में जाना जाता है और इसका आध्यात्मिक महत्व बहुत बड़ा है।
द्वारिका नगरी का ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व
वैज्ञानिक खोजों के अनुसार, गुजरात के द्वारका क्षेत्र में समुद्र के अंदर भी प्राचीन अवशेष मिले हैं। यह प्रमाण विरासत और इतिहास में द्वारिका नगरी की महत्ता को और बढ़ाते हैं। ऐसी मान्यता है कि द्वाराहाट को भी इसी पौराणिक नगर से जोड़ा जाता है।
शांति और संस्कृति का प्रतीक
द्वारिका नगरी कभी न कोई साम्राज्यवादी शासक बनकर नहीं रही, बल्कि यह शांति, धर्म और संस्कृति का केंद्र रही। भगवान श्रीकृष्ण ने इसे अपने अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन और सुरक्षा का प्रतीक बनाया। यही कारण है कि द्वाराहाट को भी द्वारिका की छाया माना जाता है।
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दूनागिरी मंदिर
दुनागिरि मंदिर द्वाराहाट से लगभग 14–20 किमी दूर द्रोण पर्वत पर स्थित है और यह देवी दुर्गा को समर्पित उत्तराखंड का एक प्रमुख शक्तिपीठ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ हनुमान जी द्वारा संजीवनी पर्वत का एक भाग गिरा था। यहां करीब 365–500 सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर पहुंचा जाता है, मंदिर से हिमालय के अद्भुत दृश्य और शांति का अनुभव किया जा सकता है।
मनसा देवी मन्दिर
यह मंदिर द्वाराहाट के निकट ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ पहुँचने के लिए पहले कार और फिर पैदल 0.5 किमी की चढ़ाई करनी पड़ती है। मंदिर रामगंगा नदी और घाटी के मनोरम दृश्य प्रदान करता है तथा यहाँ भक्त जन अपने मनोकामना पूर्ति हेतु आते हैं।
मृत्युंजय मन्दिर
यह मंदिर शिव के मृत्युंजय रूप को समर्पित है और द्वाराहाट के अति प्राचीन तथा मुख्यतम मंदिरों में गिना जाता है। इसकी स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व इसे अनूठा बनाता है तथा यह लोगों को रोग-मुक्ति और आरोग्यता हेतु स्थानीय आकर्षण का केंद्र है।
रतन देव मंदिर समूह
इस मंदिर समूह में नौ मंदिर हैं, जिनमें मुख्य तीन भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव को समर्पित हैं। यह 11वीं-13वीं सदी के हैं और अपनी सामूहिक स्थापत्य शैली व पुरातात्विक महत्ता के लिए उल्लेखनीय हैं।
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बद्रीनाथ मंदिर
यह मंदिर विष्णु के बद्रीनाथ स्वरूप को समर्पित है। यह लगभग 11वीं शताब्दी का है और इसकी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्ता द्वाराहाट में अलग पहचान बनाती है।
कचहरी देवता मंदिर
यह मंदिर अपनी सादगी और स्थानीय आस्था के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार लोग पूजा करने आते हैं।
पांडवखोली
यह स्थान पांडवों की गुफा और गहरे धार्मिक इतिहास के कारण प्रसिद्ध है, तीर्थ और ट्रेकिंग, दोनों ही दृष्टि से लोकप्रिय है।
योगदा सत्संग शाखा आश्रम
पंचाचूली की तलहटी में स्थित इस योगिक आश्रम और गुफा में भक्त ध्यान व योगाभ्यास हेतु आते हैं। यह परम गुरु महावतार बाबाजी की गुफा के समीप है।
सुखा देवी मंदिर
द्वाराहाट के नजदीक पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर रमणीय दृश्य और प्राकृतिक शांति के लिए खास मन जाता है, यहाँ से आसपास की घाटियों के सुंदर दृश्य देखे जा सकते हैं।
रतनदेव मंदिर
रतनदेव मंदिर अपने विशेष आध्यात्मिक माहौल के लिए प्रसिद्ध है, यह ऐतिहासिक भी है।