उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में अब विज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बच्चे प्रयोगों और अनुभवों के माध्यम से विज्ञान को समझेंगे। प्रदेश में शुरू होने जा रही 21 दिवसीय विज्ञान यात्रा शिक्षा के क्षेत्र में एक नई पहल मानी जा रही है। इस यात्रा का उद्देश्य विद्यार्थियों और शिक्षकों में वैज्ञानिक सोच विकसित करना तथा विज्ञान को रोचक और आसान बनाना है। यह विज्ञान यात्रा “साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी” संस्था द्वारा आयोजित की जा रही है। खास बात यह है कि इस अभियान से देश के प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक और आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर पद्मश्री डॉ. एचसी वर्मा भी जुड़ रहे हैं। भौतिक विज्ञान को आसान भाषा और सरल प्रयोगों के जरिए समझाने के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध प्रो. वर्मा बच्चों को विज्ञान के कठिन सिद्धांत बेहद रोचक तरीके से सिखाएंगे। उनके जुड़ने से विद्यार्थियों और शिक्षकों में खास उत्साह देखा जा रहा है।
इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य रटने वाली शिक्षा पद्धति को खत्म कर प्रयोगात्मक और अनुभवात्मक शिक्षा को बढ़ावा देना है। नई शिक्षा नीति 2020 भी इसी दिशा में काम करने पर जोर देती है, जहां बच्चे केवल पढ़ें नहीं बल्कि स्वयं प्रयोग करके चीजों को समझें। विज्ञान यात्रा के दौरान शिक्षकों को भी विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वे स्थानीय संसाधनों की मदद से स्कूलों में विज्ञान के प्रयोग करा सकें।
कार्यक्रम समन्वयकों के अनुसार यह यात्रा उत्तराखंड के विभिन्न जिलों और डायट केंद्रों से होकर गुजरेगी। 18 और 19 मई को डायट अल्मोड़ा में विशेष कार्यशाला आयोजित की जाएगी, जबकि 20 और 21 मई को डायट बागेश्वर में विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए संवाद कार्यक्रम होंगे। इसके अलावा नैनीताल, बागेश्वर, अल्मोड़ा, वज्यूला और द्वाराहाट जैसे क्षेत्रों के शिक्षण संस्थानों में भी यह अभियान पहुंचेगा।
प्रो. एचसी वर्मा का मानना है कि विज्ञान केवल किताबों का विषय नहीं, बल्कि सोचने और समझने का तरीका है। यदि बच्चों में बचपन से ही सवाल पूछने और प्रयोग करने की आदत विकसित हो जाए तो वे जीवन में हर समस्या का समाधान खोज सकते हैं। यही कारण है कि इस यात्रा को केवल एक शैक्षिक कार्यक्रम नहीं बल्कि वैज्ञानिक जागरूकता अभियान के रूप में देखा जा रहा है। प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए यह विज्ञान यात्रा किसी प्रेरणा से कम नहीं होगी। जहां अक्सर संसाधनों की कमी के कारण बच्चों को प्रयोगात्मक शिक्षा नहीं मिल पाती, वहां इस तरह की पहल नई उम्मीद लेकर आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे कार्यक्रम लगातार चलते रहे तो आने वाले समय में उत्तराखंड के छात्र विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं।
विज्ञान को अलग-थलग करके नहीं पढ़ाया जा सकता। मेरे छात्रों के जीवन के बारे में जाने बिना स्कूल में विज्ञान नहीं पढ़ाया जा सकता,” आईआईटी-कानपुर के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एचसी वर्मा कहते हैं।
