उत्तराखंड की लोकसंस्कृति अपनी अनूठी परंपराओं, रीति-रिवाजों और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए जानी जाती है। इन्हीं पारंपरिक लोकपर्वों में से एक है ‘खतड़ुवा’, जो मुख्य रूप से कुमाऊं क्षेत्र में मनाया जाता है। यह पर्व केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि बदलते मौसम, स्वच्छता, पशुधन की देखभाल और ग्रामीण जीवनशैली से गहराई से जुड़ी लोकपरंपरा है। वर्षाकाल की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन का संदेश देने वाला यह पर्व कन्या संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है।
ऋतु परिवर्तन का संदेश देता है खतड़ुवा
भाद्रपद मास के समाप्त होने और आश्विन मास के आरंभ के साथ पहाड़ों में मौसम करवट लेने लगता है। बरसात के लंबे दौर के बाद वातावरण में ठंडक बढ़ने लगती है और धीरे-धीरे शीत ऋतु के आगमन की आहट सुनाई देने लगती है। ऐसे समय में घरों में लंबे समय से रखे रजाई-गद्दे, कंबल और गर्म कपड़े बाहर निकाले जाते हैं। चौमास के दौरान नमी और सीलन के कारण इनमें फफूंद और कीट लगने की आशंका रहती है। इसलिए खतड़ुवा पर्व के आसपास ग्रामीण परिवार अपने बिस्तरों और अन्य घरेलू सामानों को धूप में सुखाते हैं। इस दृष्टि से भी खतड़ुवा को मौसम परिवर्तन के साथ स्वच्छता और स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है।
‘खतड़ुवा’ शब्द की उत्पत्ति को कुमाऊं में प्रचलित ‘खातड़’ या ‘खातड़ि’ शब्द से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय बोली में ‘खातड़’ का संबंध रजाई-गद्दे और बिस्तर से माना जाता है। इस कारण भी पर्व की परंपराओं में घर की सफाई और बिस्तरों को धूप दिखाने का विशेष महत्व दिखाई देता है।
पशुधन और गोठ की सफाई से जुड़ी परंपरा
पहाड़ का पारंपरिक जीवन पशुधन और कृषि पर आधारित रहा है। ऐसे में गाय, बैल और अन्य पशु ग्रामीण परिवारों की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। खतड़ुवा पर्व इसी पशुधन की सुरक्षा और स्वच्छता से भी जुड़ा हुआ है।बरसात के चार महीनों में गोशालाओं यानी गोठ में नमी और गंदगी बढ़ जाती है। ऐसी परिस्थितियों में कीड़े-मकोड़े और अन्य जीव-जंतु पशुओं के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। इसलिए इस अवसर पर गोठ की विशेष सफाई की जाती है। पशुओं को नहलाया-धुलाया जाता है और उनके रहने के स्थान पर साफ तथा मुलायम पिरूल बिछाया जाता है।
कई क्षेत्रों में महिलाएं इस दिन जंगल और खेतों से पशुओं के लिए हरी-भरी पौष्टिक घास लेकर आती हैं। पशुओं को भरपेट घास और पकवान खिलाए जाते हैं तथा उनकी लंबी उम्र और स्वस्थ रहने की कामना की जाती है। इसी अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत में पशु और उसके मालिक दोनों की दीर्घायु तथा समृद्धि की कामना की जाती है—
“औंसो ल्यूंलो, बेटुलो ल्योंलो,
गरगिलो ल्यूंलो, गाड़-गधेरान है ल्यूंलो…”
इन लोकगीतों में पहाड़ के ग्रामीण जीवन, पशुधन के प्रति प्रेम और प्रकृति से मनुष्य के रिश्ते की झलक साफ दिखाई देती है।
‘खतड़ू’ तैयार करने की परंपरा
खतड़ुवा पर्व मनाने के तरीके अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ भिन्न रहे हैं। कई गांवों में शाम तक किसी बाखली, खुले स्थान या चौराहे पर एक लंबी लकड़ी गाड़ी जाती है। इसके आसपास सूखी घास, पिरूल, झाड़ियां और लकड़ियां एकत्र की जाती हैं और उन्हें पुतले का आकार दिया जाता है। इस संरचना को स्थानीय रूप से ‘खतड़ू’ कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में कांस के पौधों को फूल सहित काटकर लाया जाता है और उन्हें बुजुर्ग महिला की आकृति दी जाती है। इसे ‘बुढ़ी’ के रूप में भी जाना जाता है। इसके बाद उसे घर के आसपास स्थापित किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस परंपरा के स्वरूप में अंतर देखने को मिलता है, लेकिन इसके पीछे ऋतु परिवर्तन, स्वच्छता और पशुधन की रक्षा की लोकमान्यता प्रमुख रूप से जुड़ी रही है।
‘भैलो जी भैलो’ से गूंज उठते हैं गांव
शाम के समय महिलाएं गोशाला में मशाल लेकर जाती हैं। कई स्थानों पर इस मशाल को ‘खतड़ुवा’ कहा जाता है। इसे गोठ के भीतर घुमाते हुए पशुओं को बीमारी और अनिष्ट से बचाने की प्रार्थना की जाती है। इसके बाद गांव के बच्चे और ग्रामीण चौराहे पर एकत्र होते हैं। गोठों से लाई गई जलती मशालों को लकड़ियों और घास के ढेर में डाल दिया जाता है। इसके साथ ही लोकगीत और पारंपरिक उद्घोष वातावरण में गूंज उठते हैं—
“भैल्लो जी भैल्लो,
भैल्लो खतड़ुवा,
गै की जीत, खतड़ुवै की हार,
भाग खतड़ुवा भाग…”
यह लोक उद्घोष प्रतीकात्मक रूप से पशुधन के स्वस्थ रहने और बीमारियों के दूर होने की कामना को व्यक्त करता है।
परंपरा के अनुसार आग और धुएं को गोठ के आसपास ले जाने का उद्देश्य वहां मौजूद कीड़े-मकोड़ों को दूर करना भी माना जाता रहा है। जलने के बाद बची राख को शुभ मानकर लोग अपने माथे पर लगाते हैं और कई स्थानों पर पशुओं के माथे पर भी राख लगाने की परंपरा रही है। पहाड़ों में इस मौसम में उपलब्ध ककड़ी और अन्य स्थानीय उपज को प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा भी देखने को मिलती है।
लोकगीतों में सुरक्षित है पहाड़ का इतिहास
खतड़ुवा की खासियत यह भी है कि इसके साथ कई लोककथाएं और लोकगीत जुड़े हुए हैं। समय के साथ इस पर्व को लेकर एक ऐतिहासिक मान्यता भी प्रचलित हुई, जिसमें इसे कुमाऊं और गढ़वाल के बीच हुए एक पुराने युद्ध से जोड़ा जाता है। कुछ ऐतिहासिक और लोकमान्यताओं के अनुसार कुमाऊं की सेना के गैड़ा सिंह और गढ़वाल की सेना के खतड़ सिंह के बीच संघर्ष की कथा खतड़ुवा पर्व से जोड़ी जाती है। एक अन्य मान्यता इसे चम्पावत के राजा रुद्रचंद के पुत्र लक्ष्मण चंद और गढ़वाल के शासक मानशाह की सेनाओं के बीच हुए संघर्ष से जोड़ती है।
इससे जुड़ा एक प्रसिद्ध लोकगीत भी है—
“भेल्लो जी भेल्लो,
गैड़ा की जीत खतड़ुवा की हार,
भाजो खतड़ुवा धारे धार…”
हालांकि खतड़ुवा की ऐतिहासिक व्याख्या को लेकर विभिन्न मत और लोकमान्यताएं मिलती हैं। इसलिए इसे केवल युद्ध-विजय के पर्व के रूप में देखना इसके व्यापक लोक-सांस्कृतिक स्वरूप को सीमित कर देता है। इसकी परंपराओं में मौसम परिवर्तन, पशुधन की देखभाल, स्वच्छता और ग्रामीण सामुदायिक जीवन के तत्व भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
आज भी प्रासंगिक है खतड़ुवा का संदेश
बदलते समय के साथ पहाड़ की जीवनशैली में काफी बदलाव आया है। पारंपरिक गोठ, पशुपालन और सामूहिक श्रम की संस्कृति कई जगह कमजोर हुई है। इसके बावजूद खतड़ुवा पर्व आज भी कुमाऊं की सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पर्व का मूल संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है—स्वच्छ घर, स्वच्छ गोठ, स्वस्थ पशुधन और बदलते मौसम के अनुसार जीवनशैली में बदलाव।
खतड़ुवा हमें यह भी याद दिलाता है कि पहाड़ की लोकपरंपराएं केवल धार्मिक आस्थाओं तक सीमित नहीं थीं। उनके भीतर प्रकृति, पर्यावरण, स्वास्थ्य, कृषि और पशुधन के संरक्षण का व्यावहारिक ज्ञान भी छिपा हुआ था। आज जब स्वच्छता और पशु स्वास्थ्य को लेकर आधुनिक अभियान चलाए जा रहे हैं, तब सदियों पुरानी यह लोकपरंपरा ग्रामीण समाज की उस सामूहिक चेतना की याद दिलाती है, जिसमें त्योहार केवल उत्सव नहीं बल्कि समाज, प्रकृति और पशुधन की देखभाल का माध्यम भी हुआ करते थे।
इसीलिए खतड़ुवा को केवल ‘गैड़ा की जीत और खतड़ की हार’ की कथा तक सीमित करने के बजाय कुमाऊं की व्यापक लोकसंस्कृति, ऋतु परिवर्तन और पशुधन संरक्षण से जुड़े पर्व के रूप में समझना इसकी परंपरागत विविधता को अधिक व्यापक रूप में सामने लाता है। खतड़ुवा वास्तव में पहाड़ की उस लोकबुद्धि का पर्व है, जिसमें उत्सव के साथ स्वच्छता है, परंपरा के साथ प्रकृति है और लोकगीतों के साथ पशुधन के प्रति संवेदना भी है।
