घी संक्रांति 2026: उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं में घी संक्रांति यानी घ्यू त्यार का विशेष स्थान है। पहाड़ों में सदियों से मनाया जाने वाला यह लोकपर्व केवल घी खाने तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती-किसानी, पशुधन, प्रकृति और समृद्धि के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। वर्ष 2026 में घी संक्रांति का पर्व सोमवार, 17 अगस्त को मनाया जाएगा। इसे भाद्रपद मास की संक्रांति और कई स्थानों पर सिंह संक्रांति से जोड़कर देखा जाता है।
घी संक्रांति को क्यों कहते हैं घ्यू त्यार?
उत्तराखंड में इस पर्व को अलग-अलग क्षेत्रों में घी त्यार, घ्यू सग्यान, घृत संक्रांति और ओलगिया नामों से जाना जाता है। ‘घी त्यार’ नाम अपने आप में इस पर्व की सबसे प्रमुख परंपरा को दर्शाता है। लोकमान्यता है कि इस दिन घी का सेवन करना शुभ माना जाता है। कई परिवारों में बच्चे-बड़े विशेष रूप से घी खाते हैं और घी से बने पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं।
खेती और पशुधन से जुड़ा पर्व
घी संक्रांति का संबंध पहाड़ की कृषि संस्कृति से भी गहरा है। यह वह समय होता है जब खेतों में फसलें बढ़ रही होती हैं और प्रकृति हरियाली से भर उठती है। पारंपरिक पहाड़ी जीवन में गाय-भैंस जैसे पशुधन परिवार की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। ऐसे में दूध और उससे बनने वाले घी को समृद्धि और स्वस्थ जीवन का प्रतीक माना गया। इस पर्व के माध्यम से लोग अच्छी फसल, स्वस्थ पशुधन और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
इस दिन क्या-क्या होता है?
घी संक्रांति के दिन घरों में घी से बने पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं। लोग घी, दही, दूध और अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं। कई परिवारों में घर के बड़े-बुजुर्ग बच्चों को घी खिलाकर उनके स्वस्थ और सुखी जीवन की कामना करते हैं। उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व सामूहिकता और आपसी मेल-जोल का अवसर भी रहा है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते हैं और पारंपरिक पकवान साझा करते हैं।
शंख और घोंघे को लेकर भी मान्यता
घी संक्रांति से जुड़ी एक दिलचस्प लोकपरंपरा में घोंघे/शंख जैसे जीवों का भी उल्लेख मिलता है। कुछ क्षेत्रों में इस दिन घोंघे को लेकर लोकविश्वास और प्रतीकात्मक परंपराएं रही हैं। हालांकि ऐसी मान्यताएं क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं और इन्हें लोकपरंपरा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
घी खाने की मान्यता क्या है?
लोकविश्वास के अनुसार घी को शरीर के लिए पौष्टिक और ऊर्जा देने वाला खाद्य माना गया। इसलिए इस पर्व पर घी खाने की परंपरा विकसित हुई। पहाड़ी समाज में इसे स्वास्थ्य, ताकत और खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि किसी भी खाद्य पदार्थ का सेवन व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य के अनुसार उचित मात्रा में ही करना चाहिए।
बदलते दौर में भी कायम है परंपरा
आधुनिक जीवनशैली और तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश के बावजूद उत्तराखंड में घी संक्रांति की परंपरा आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ती है। गांवों में ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग शहरों में रहने वाले उत्तराखंडी परिवार भी इस दिन घर पर घी और पारंपरिक पकवान बनाकर पर्व मनाते हैं। घी संक्रांति केवल एक धार्मिक या खान-पान से जुड़ा त्योहार नहीं, बल्कि यह पहाड़ की कृषि संस्कृति, पशुधन, प्रकृति और पारिवारिक रिश्तों की विरासत को आगे बढ़ाने वाला लोकपर्व है। यही कारण है कि आज भी 17 अगस्त को उत्तराखंड के घर-घर में घ्यू त्यार की खुशबू और लोकपरंपराओं की मिठास महसूस की जाएगी। घी संक्रांति का संदेश यही है—प्रकृति और अन्न के प्रति कृतज्ञता, परिवार में खुशहाली और अपनी लोकसंस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना