उत्तरकाशी: भारत-चीन सीमा के नजदीक स्थित उत्तरकाशी जिले का ऐतिहासिक जादूंग गांव लंबे समय बाद फिर से जीवन से गुलजार होने जा रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान सुरक्षा कारणों से यह गांव खाली कर दिया गया था। तब से यह सीमांत क्षेत्र वीरान पड़ा था। अब सीमा पुनर्वास योजना के तहत सरकार ने इस गांव को फिर से आबाद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिससे यहाँ के लोगों में नई उम्मीद जागी है।उत्तरकाशी के नेलांग घाटी में बसा जादूंग गांव सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। समुद्र तल से करीब 10,000 फीट की ऊंचाई पर बसे इस गांव के लोग कभी तिब्बत के साथ व्यापारिक संबंधों के लिए जाने जाते थे। लेकिन युद्ध के बाद यहां का जीवन ठहर गया। अब, सरकार की नई पहल न केवल सीमांत सुरक्षा के लिहाज से अहम है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के पुनरुद्धार की दिशा में भी बड़ा कदम है।
यह भी पढ़ें:शादी में दिखावा हुआ महंगा! शादी में सादगी अनिवार्य, उल्लंघन पर होगा ₹1 लाख जुर्माना।
जादूंग गांव में 23 परिवारों को पुनर्वासित किया जा रहा है, जिनके लिए पहाड़ी शैली में आधुनिक तकनीक से तैयार घर बनाए जा रहे हैं। इन मकानों के निर्माण में स्थानीय पत्थर, लकड़ी और पर्यावरण के अनुकूल सामग्री का उपयोग होगा, ताकि पारंपरिक वास्तुकला की झलक बरकरार रहे। प्रत्येक घर में सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन और बेहतर इन्सुलेशन जैसी आधुनिक सुविधाएं भी जोड़ी जा रही हैं, ताकि सर्द इलाकों में रहने वाले परिवारों को किसी कठिनाई का सामना न करना पड़े।स्थानीय प्रशासन ने बताया कि इस परियोजना से न केवल सीमांत क्षेत्र में जनजीवन लौटेगा, बल्कि रोजगार और पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। जादूंग, नेलांग घाटी और हरसिल जैसे क्षेत्रों में अब सरकार इको-टूरिज्म और सीमांत पर्यटन को बढ़ावा देने पर भी कार्य कर रही है। यहां ऐतिहासिक मंदिर, भव्य पर्वतीय दृश्य और तिब्बती संस्कृति की झलक देखने को मिलती है, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकती है।
इस पुनर्वास योजना में सीमा विकास विभाग, भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त भूमिका है। सुरक्षा एजेंसियों ने भी इसे सामरिक दृष्टि से सकारात्मक पहल बताया है। गांव के पुन: बसने से सीमांत क्षेत्रों में भारतीय उपस्थिति और मजबूत होगी, जो चीन सीमा पर निगरानी और स्थायी बस्तियों की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।ग्राम सभा के लोगों में इस निर्णय को लेकर खुशी का माहौल है। बुजुर्ग निवासियों ने बताया कि दशकों बाद अपने पुश्तैनी घरों में लौटने का अवसर मिल रहा है। यह केवल घरों का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, संस्कृति और पहचान से पुनः जुड़ने का अवसर है।सरकार का उद्देश्य अगले एक वर्ष में निर्माण कार्य पूरा कर इन परिवारों को स्थायी रूप से बसाना है। जादूंग के पुनर्वास से उत्तराखंड में सीमांत विकास की नई कहानी लिखी जाएगी — जहां विकास और विरासत दोनों साथ चलेंगे।
