अल्मोड़ा: राजुला-मालूशाही और अजुवा-बफौल के रचयिता जुगल किशोर पेटशाली का निधन हो गया। वे 79 वर्ष के थे उन्होंने अल्मोड़ा में अपने पैतृक आवास पर आखिरी सांस ली। पेटशाली कुमाऊँनी बोली-भाषा की लोक संस्कृति, लोककथाओं, लोकधुनों और रंगकर्म के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में राजुला-मालूशाही, अजुवा-बफौल, जय बाला गोरिया, बखत जीया जागरया जैसी पुस्तकें शामिल हैं।
जिन्हें राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। उन्हें जयशंकर प्रसाद पुरस्कार, सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार, उत्तराखंड संस्कृतिकर्मी पुरस्कार और कुमाऊं गौरव सम्मान से नवाजा गया। वे काफी लंबे समय से अस्वस्थ थे लेकिन लेखन कार्य जारी रखा। जुगल किशोर पेटशाली अपने पीछे पत्नी पुष्पा पेटशाली और छह बेटों सहित बड़े परिवार को छोड़ कर चले गए। उनका अंतिम संस्कार लखुड़ियार घाट पर हुआ।

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पेटशाली का रचना संसार
पेटशाली के नाटकों में लोकगाथाओं की जीवंत झलक दिखाई देती है। राजुला-मालूशाही गीत-नाटिका में भोट प्रदेश की राजुला और बैराठ के राजकुमार मालूशाही का प्रेम अमर हो गया। जय बाला गोरिया नाटिका में गढ़ी चंपावत की रानी कालिंगा की पीड़ा सामने आती है। अजुवा-बफौल नाटक में बफौल भाइयों की वीरता का वर्णन है। नौ-लखा दीवान नाटक में भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय के खिलाफ उठे प्रतिकार को स्वर दिया गया है। कुमाऊंनी बोली-भाषा की ठसक और पारंपरिक लोक धुनों ने उनके नाटकों को एक अलग ही पहचान दी। पेटशाली अब तक 18 से अधिक पुस्तकें लिख चुके थे। उनकी अन्य कृतियों में कुमाऊं के संस्कार गीत, बखत, उत्तरांचल के लोक वाद्य, कुमाऊंनी लोकगीत, पिंगला भृतहरि, कुमाऊं की लोकगाथाएं, गोरी प्यारो लागो तेरो झनकारो, भ्रमर गीत, मेरे नाटक, जी रया जागि रया, गंगनाथ-गीतावली, विभूति योग और हे राम जैसी कृतियां प्रमुख हैं। उनकी कई रचनाओं का आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रसारण हुआ और अनेक नाटकों की सफल मंचीय प्रस्तुतियां भी हुईं।