अलवर: अलवर से आई एक दिल दहलाने वाली खबर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आधुनिक होते समाज के बीच भी दहेज की कुप्रथा आज भी हमारे बीच जिंदा है। राजस्थान के अलवर जिले में दहेज के भूखे सास-ससुर ने अपनी बहू को जिंदा जला दिया। यह वारदात क्रूरता की सारी सीमाएं पार करती है, क्योंकि बहू को घांस-फूस और उपलों के ढेर पर डालकर आग लगा दी गई। इस घटना ने ना सिर्फ इलाके को हिलाकर रख दिया है बल्कि पूरे समाज के सामने दहेज के खिलाफ एक गंभीर सवाल भी खड़ा किया है।
घटना का विवरण
जानकारी के मुताबिक, अलवर जिले के एक गांव में रहने वाली 23 वर्षीय महिला की शादी करीब तीन साल पहले हुई थी। शादी के बाद से ही ससुराल में उसे दहेज के लिए परेशान किया जाता था। उसके मायके वालों पर मोटरसाइकिल और सोने के गहनों की मांग पूरी करने का दबाव डाला जा रहा था। जब बार-बार मायके से मदद न मिल सकी, तो घर वालों ने उसकी जिंदगी को जानबूझकर नरक बना दिया।
बीती रात झगड़े के दौरान सास और ससुर ने बहू को जबरन पकड़ लिया और बाहर ले जाकर उपलों के ढेर पर फेंक दिया। इसके बाद केरोसिन डालकर आग लगा दी। चीख-पुकार सुनकर आस-पड़ोस के लोग पहुंचे, लेकिन तब तक महिला बुरी तरह झुलस चुकी थी। तुरंत उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
पुलिस जांच और कार्रवाई
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची। मृतका के पिता ने अहिल्यादेवी थाना में रिपोर्ट दर्ज करवाई है। रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर यह आरोप लगाया गया है कि सास-ससुर लंबे समय से दहेज की मांग कर रहे थे और उसी के लिए बहू की हत्या की गई है। पुलिस ने दोनों आरोपियों को हिरासत में ले लिया है और मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है। महिला आयोग और स्थानीय सामाजिक संगठनों ने इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है और मांग की है कि आरोपियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए ताकि भविष्य में कोई और परिवार इस तरह का अपराध करने की हिम्मत न जुटा सके।
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समाज और कानून पर सवाल
यह घटना कोई पहली बार नहीं हुई है। हर साल देशभर में सैकड़ों महिलाएं दहेज की बलि चढ़ती हैं। 2023 की राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में दहेज हत्या के हजारों मामले दर्ज किए गए हैं। यह सवाल उठता है कि कठोर कानून जैसे दहेज निषेध अधिनियम 1961 और धारा 304B (भारतीय दंड संहिता) के होते हुए भी ऐसे मामलों में क्यों कमी नहीं आ रही है। समस्या का एक बड़ा कारण सामाजिक सोच है। कई जगहों पर बेटी को ‘बोझ’ और दहेज को ‘सम्मान’ का हिस्सा मान लिया जाता है। यही मानसिकता जघन्य अपराधों को जन्म देती है।
पीड़िता की मायके वालों की गुहार
पीड़िता के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। उसके पिता ने कहा कि उन्होंने अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज में दिया था। लेकिन जब भी वे ससुराल जाते, वहां से बस ताने और धमकी सुनने को मिलती थी। बहू ने कई बार फोन पर बताया था कि उसे जलाने की धमकी दी जा रही है, लेकिन परिवार यह सोचकर चुप हो जाता कि शायद मामला धीरे-धीरे शांत हो जाएगा। अब उनकी आंखों के सामने उनकी बेटी की राख है, जिसने समाज और कानून दोनों से मदद की उम्मीद की थी।
मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया
घटना के बाद महिला अधिकार संगठनों ने कहा है कि इस तरह की हत्याएं महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान पर सीधा आघात हैं। उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। साथ ही समाज में जागरूकता फैलाने पर भी जोर दिया गया कि लोग बेटियों और बहुओं को दहेज की आग में ना झोंके।
