द्वाराहाट: अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट में आयोजित ऐतिहासिक स्याल्दे-बिखौती मेले के अंतर्गत बुधवार को ओड़ा भेटने की पारंपरिक रस्म पूरे उत्साह, उल्लास और सांस्कृतिक गरिमा के साथ संपन्न हुई। यह आयोजन न केवल स्थानीय लोगों के लिए आस्था और परंपरा का प्रतीक है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी है। ओड़ा भेटने की रस्म की शुरुआत आल धड़े द्वारा की गई, जिसमें विजयपुर, किरोली, भौंरा, डढोली, तल्ली मिरई, मल्ली मिरई और पिनोली गांवों की सात जोड़ी नगाड़े-निशानों ने भाग लिया। इसके पश्चात गरख धड़े की बारी आई, जिसमें सलना, बसेरा, असगोली, कुई, धन्यारी, बूंगा, बेढूली, छतगुल्ला, कूना, गवाड़ और कोटिला गांवों की 11 जोड़ी नगाड़े निशानों के साथ ग्रामीणों ने अपनी सहभागिता दर्ज कराई। इस प्रकार कुल 18 जोड़ी नगाड़े-निशानों ने इस परंपरा को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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समय निर्धारण के अनुसार, आल धड़े ने शाम 5 बजे और गरख धड़े ने 6 बजे ओड़ा भेटने की रस्म निभाई। इस दौरान रणबांकुरों का जोश और उत्साह देखते ही बन रहा था। गांव-गांव से आए लोग ढोल-नगाड़ों, मशकबीन, रणसिंघा, हुड़के और चिमटे की धुन पर वीररस से भरपूर पारंपरिक खेल प्रस्तुत करते हुए मेले स्थल पर पहुंचे हाथों में लाठियां लिए सैकड़ों लोग झोड़े और भगनौल गीत गाते हुए बारी-बारी से इस रस्म को निभाते नजर आए। इस दृश्य ने पूरे वातावरण को लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया। यह परंपरा न केवल सामूहिक एकता और भाईचारे का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाती है कि आधुनिकता के दौर में भी लोग अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं।
ओड़ा भेटने की रस्म के बाद सभी गांवों के लोग ढोल-नगाड़ों और लोकगीतों के साथ शीतला पुष्कर सांस्कृतिक मैदान में एकत्रित हुए। यहां झोड़े और चांचरी जैसे पारंपरिक लोकनृत्यों का आकर्षक प्रदर्शन किया गया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस दौरान पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल बना रहा। कार्यक्रम में क्षेत्र के कई गणमान्य लोग भी उपस्थित रहे, जिनमें विधायक मदन बिष्ट, मेला अध्यक्ष संगीता आर्या, उपाध्यक्ष हेम रावत, गिरीश चौधरी, पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी, महेश नेगी, ब्लॉक प्रमुख आरती किरौला, नंदिता भट्ट, रमेश पुजारी, नारायण रावत, नरेंद्र अधिकारी, चारु तिवारी, पूर्व प्रमुख दीपक किरौला, जगत रौतेला और पीसी तिवारी सहित अन्य लोग शामिल थे। कुल मिलाकर, स्याल्दे-बिखौती मेले में ओड़ा भेटने की रस्म ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपराएं आज भी जीवंत हैं और आने वाली पीढ़ियों को अपनी पहचान और विरासत से जोड़ने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
