नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। गृह मंत्रालय द्वारा जारी नए दिशानिर्देशों के अनुसार, अब आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले ही ‘वंदे मातरम’ के पूरे छह अंतरा गाए या बजाए जाएंगे। इस संस्करण की कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड है, जिसमें वे चार छंद भी शामिल हैं, जिन्हें 1937 में कांग्रेस ने हटा दिया था। यह फैसला राष्ट्रगीत की मूल भावना को पुनर्जीवित करने की दिशा में बड़ा प्रयास है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1882 में रचित यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना। ‘आनंदमठ’ उपन्यास से लिया गया यह गीत 1950 में संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया। लेकिन लंबे समय से केवल पहले दो अंतरे ही प्रचलित थे। नए प्रोटोकॉल से अब सभी छह अंतरे अनिवार्य होंगे, जो राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक गौरव को मजबूत करेंगे।
नए दिशानिर्देशों की मुख्य बातेंगृह मंत्रालय के आदेश स्पष्ट हैं। सरकारी समारोहों, स्कूलों, परेडों (सिवाय कुछ अपवादों) और राष्ट्रपति-राज्यपाल के आगमन-प्रस्थान पर ‘वंदे मातरम’ बजना जरूरी होगा। तिरंगा फहराने, भाषणों से पहले-बाद में इसे प्राथमिकता मिलेगी। सभी उपस्थितियों को खड़े होकर सम्मान देना होगा, ठीक राष्ट्रगान की तरह। हालांकि, सिनेमा हॉल्स में फिल्म शुरू होने से पहले यह लागू नहीं होगा। स्कूलों में प्रार्थना सभा की शुरुआत इससे होनी चाहिए। इस बदलाव का उद्देश्य राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति एकरूपता और सम्मान सुनिश्चित करना है। मंत्रालय का कहना है कि इससे युवा पीढ़ी राष्ट्रगीत की पूरी शक्ति से परिचित होगी। व्यावहारिकता के लिए साउंड सिस्टम, गायकों की व्यवस्था और लिखित प्रतियां उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विवाद’वंदे मातरम’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने पर यह कदम उठाया गया। 1937 में कांग्रेस ने धार्मिक संवेदनशीलता के नाम पर चार अंतरे हटाए, क्योंकि कुछ पंक्तियां मूर्तिपूजा से जुड़ी मानी गईं। स्वतंत्रता आंदोलन में यह गीत लाखों स्वदेशी आंदोलनकारियों का प्रेरणा स्रोत था। महात्मा गांधी से लेकर सुभाष चंद्र बोस तक ने इसे अपनाया। लेकिन राष्ट्रगान के चयन में ‘जन गण मन’ को प्राथमिकता मिली। विपक्षी दलों ने पहले भी इसकी मांग उठाई। अब मोदी सरकार ने इसे लागू कर राष्ट्रवाद को नई ऊंचाई दी।
आलोचक कह सकते हैं कि यह अनावश्यक बोझ है, लेकिन समर्थक इसे सांस्कृतिक पुनरुत्थान मानते हैं। प्रभाव और अपेक्षाएंयह बदलाव सरकारी कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों से लेकर सार्वजनिक आयोजनों तक फैलेगा। इससे राष्ट्रीय गीत का गौरव बढ़ेगा और इतिहास से जुड़ाव मजबूत होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत होगी। आने वाले समय में ‘वंदे मातरम’ की धुन हर आधिकारिक मंच पर गूंजेगी, जो भारत की सांस्कृतिक धरोहर को मजबूत करेगी।
