श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो आमतौर पर अगस्त या सितंबर माह में पड़ता है। यह पर्व भारत और विश्वभर में श्रीकृष्ण के भक्तों द्वारा बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। आइए, इस पर्व के समय, महत्व और मान्यताओं के बारे में विस्तार से जानते हैं।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कब होती है?
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह तिथि रोहिणी नक्षत्र के साथ विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में मध्यरात्रि को हुआ था, इसलिए यह पर्व रात के समय विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। साल 2025 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 16 अगस्त को मनाई जाएगी।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है?
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता है, जिन्होंने धरती पर अधर्म और अत्याचार का नाश करने के लिए जन्म लिया था। शास्त्रों के अनुसार, श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में हुआ था। उस समय मथुरा में कंस का अत्याचारी शासन था, और कंस को यह भविष्यवाणी मिली थी कि वह देवकी के आठवें पुत्र द्वारा मारा जाएगा। इस डर से कंस ने देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने चमत्कारिक रूप से जन्म लिया और वासुदेव उन्हें गोकुल में नंद और यशोदा के पास ले गए।
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जन्माष्टमी का यह पर्व श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी के साथ-साथ उनके जीवन, शिक्षाओं और लीलाओं का स्मरण करने का अवसर है। यह पर्व भक्तों को भक्ति, प्रेम, और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की मान्यताएँ
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से जुड़ी कई मान्यताएँ और परंपराएँ हैं, जो इस पर्व को और भी विशेष बनाती हैं:
- उपवास और पूजा: जन्माष्टमी के दिन भक्त उपवास रखते हैं, जो मध्यरात्रि को श्रीकृष्ण के जन्म के समय खोला जाता है। इस दिन मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को सजाया जाता है, और भोग लगाया जाता है।
- दही-हांडी: यह परंपरा विशेष रूप से महाराष्ट्र और गुजरात में लोकप्रिय है। इसे “गोविंदा आला रे” के नाम से भी जाना जाता है। इस आयोजन में युवा एक मानव पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर लटकी मटकी (दही से भरी हांडी) को तोड़ते हैं, जो श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का प्रतीक है।
- रासलीला: श्रीकृष्ण की रासलीला, जिसमें वे गोपियों के साथ नृत्य करते थे, इस पर्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मथुरा, वृंदावन और अन्य स्थानों पर रासलीला का मंचन किया जाता है, जो भक्तों को श्रीकृष्ण के प्रेम और भक्ति के रस में डुबो देता है।
- मध्यरात्रि उत्सव: चूँकि श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इस समय मंदिरों में विशेष आरती और भजन-कीर्तन होते हैं। भक्त जागरण करते हैं और भगवान के जन्म का उत्सव मनाते हैं।
- भक्ति और ध्यान: इस दिन भक्त श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करते हैं, जो श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का संग्रह है। यह पर्व भक्तों को अपने जीवन में धर्म, कर्म, और भक्ति के महत्व को समझने का अवसर देता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महत्व
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्व भी है। यह हमें श्रीकृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेने और उनके द्वारा दिए गए संदेशों को अपनाने की प्रेरणा देता है। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के माध्यम से कर्मयोग, भक्तियोग, और ज्ञानयोग का उपदेश दिया, जो आज भी प्रासंगिक है। यह पर्व हमें प्रेम, करुणा, और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एक ऐसा पर्व है जो भक्ति, उत्साह, और आनंद का प्रतीक है। यह हमें श्रीकृष्ण की लीलाओं और शिक्षाओं के माध्यम से जीवन में संतुलन और सकारात्मकता लाने की प्रेरणा देता है। मथुरा, वृंदावन, द्वारका, और अन्य स्थानों पर इस पर्व का उत्साह देखते ही बनता है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को भी बढ़ावा देता है।
इस जन्माष्टमी पर, आइए हम श्रीकृष्ण के प्रेम और भक्ति के रंग में रंग जाएँ और उनके संदेशों को अपने जीवन में उतारें। “जय श्रीकृष्ण!”