हल्द्वानी: हल्द्वानी में आयोजित जनसभा उस समय भावुक हो उठी जब लाड़ली के ताऊ ने मंच से जनता से अपनी पीड़ा साझा की। उनका दर्द सिर्फ एक पिता या परिजन का नहीं था, बल्कि हर उस परिवार के दिल की आवाज थी, जिसने अपनी संतान को खोया है और न्याय के लिए दर-दर ठोकरें खाई हैं। उन्होंने कहा, “हमारी बच्ची पिथौरागढ़ से चलकर हंसी-खुशी हल्द्वानी आई थी। लेकिन हमें उसकी लाश वापस मिली। बेटी के शरीर पर सिगरेट से दागे हुए निशान आज भी हमारे दिल को जलाते हैं। अगर हम न्याय दिलाए बगैर मर गए तो प्रदेश की हर बेटी का यही हश्र होगा।
इन शब्दों ने वहां मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम कर दीं। सभा स्थल पर इससे पहले कभी इतनी गहरी चुप्पी नहीं छाई थी। इसके बाद जब लोगों ने एक स्वर में “बेटी हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं” का नारा लगाया तो पूरा माहौल आक्रोश और संवेदनाओं से भर गया।
न्याय व्यवस्था पर उठे सवाल
लाड़ली के ताऊ ने दो टूक कहा कि अगर प्रदेश की न्याय व्यवस्था ईमानदार और मजबूत होती तो आज यह दिन देखने की नौबत न आती। उन्होंने सवाल किया कि आखिर क्या उत्तराखंड में कोई काबिल वकील नहीं हैं जो सरकार को मध्यप्रदेश से वकील बुलाने पड़ रहे हैं? जब सरकार अपने ही राज्य के वकीलों पर भरोसा नहीं कर रही, तो आम जनता उनसे न्याय की उम्मीद कैसे करे?
उन्होंने कहा कि सरकारी वकीलों की नियुक्ति सिर्फ “सेटिंग-गेटिंग” के आधार पर होना सबसे बड़ी समस्या है। नेताओं की पत्नियां और बच्चे इस सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं, जबकि काबिल और मेहनती छात्र दरकिनार कर दिए जाते हैं। जब तक ईमानदारी से परीक्षाएं कराकर योग्य उम्मीदवार सरकारी वकील नहीं बनाए जाएंगे, तब तक हर केस में आरोपी आसानी से छूटते रहेंगे।
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राजनीति और पीड़ित परिवार
लाड़ली के ताऊ ने याद दिलाया कि जब उनकी बेटी की निर्मम हत्या हुई थी, उस समय कांग्रेस की सरकार थी। तब प्रदेश की जनता और खासतौर पर कुमाऊं संभाग पूरी मजबूती से उनके साथ खड़ा हुआ। जनदबाव इतना बढ़ा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को उनके सामने झुकना पड़ा और उन्होंने तीन लाख रुपये आर्थिक सहायता का चेक भेजा। लेकिन परिवार ने उस चेक को ठुकरा दिया था। उनका कहना था कि वे दया के पैसों के भूखे नहीं हैं, उन्हें तो सिर्फ न्याय चाहिए।
इस घटना ने यह साफ किया था कि सिर्फ आर्थिक मदद से पीड़ित परिवार का जख्म नहीं भर सकता। सबसे जरूरी है न्याय और अपराधियों को उनके कर्मों की सजा मिलना। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह न्याय व्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है।
समाज की जिम्मेदारी
जनसभा में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। युवाओं से लेकर महिलाओं और बुजुर्गों तक सभी अपने आंसू नहीं रोक पाए। सबका मानना था कि यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं है, बल्कि पूरे समाज का सवाल है। अगर आज इस बेटी को न्याय नहीं मिला तो कल किसी और घर की बेटी की जान सुरक्षित नहीं रहेगी।
लोगों ने सरकार पर दबाव बनाने का संकल्प लिया कि जब तक दोषियों को सजा नहीं मिलती, तब तक आंदोलन चलता रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करे जिसमें किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार को न्याय पाने के लिए दर-दर भटकना न पड़े।
