द्वाराहाट (अल्मोड़ा): उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट क्षेत्र में स्थित छोटे से छतगुल्ला गांव की रहने वाली प्रतिभाशाली पैरा एथलीट गरिमा जोशी ने एक बार फिर अपनी बहादुरी और जज्बे से सबको प्रभावित कर दिया है। नई दिल्ली के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रां प्री में गरिमा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए तीन पदक अपने नाम किए। इसमें एक स्वर्ण और दो रजत पदक शामिल हैं। इस उपलब्धि ने न सिर्फ भारत बल्कि पूरे उत्तराखंड का सिर ऊंचा कर दिया है। यह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता भारत सहित रूस, नेपाल, भूटान, हांगकांग, सर्बिया, बोस्निया-हर्ज़ेगोविना और मिस्र जैसे देशों के चुनिंदा खिलाड़ियों का मेला थी।

महिला एफ-55 वर्ग में प्रतिस्पर्धा कर रही गरिमा ने डिस्कस थ्रो में 19.24 मीटर के अपने व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ स्वर्ण पदक जीता। वहीं, जैवलिन थ्रो में 16.80 मीटर और शॉट पुट में 5.40 मीटर के शानदार प्रयासों से उन्होंने दो रजत पदक हासिल किए। ये सभी उनके करियर के अब तक के सर्वश्रेष्ठ निशान हैं, जो उनकी कड़ी मेहनत और लगन का प्रमाण हैं।एफ-55 वर्ग पैरा एथलेटिक्स की एक विशेष श्रेणी है, जिसमें स्पाइनल कॉर्ड इंजरी या निचले अंगों की अक्षमता से जूझ रहे एथलीट भाग लेते हैं। यहां खिलाड़ी विशेष रूप से डिजाइन की गई सीटेड थ्रोइंग बेंच पर बैठकर थ्रो करते हैं। इस बेंच की अधिकतम ऊंचाई लगभग 75 सेंटीमीटर होती है, ताकि सभी प्रतियोगियों के बीच पूर्ण निष्पक्षता बनी रहे।
गरिमा ने इसी चुनौतीपूर्ण स्थिति में विश्व स्तरीय प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़कर अपनी श्रेष्ठता साबित की। उनके कोच और सहयोगी बताते हैं कि रोजाना की सख्त ट्रेनिंग और मानसिक मजबूती ने उन्हें यह मुकाम दिलाया।गरिमा जोशी का सफर किसी प्रेरणा कथा से कम नहीं है। छतगुल्ला गांव की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने विकलांगता को कभी बाधा नहीं बनने दिया। बचपन से ही खेलों में रुचि रखने वाली गरिमा ने पैरा एथलेटिक्स को अपनाया और धीरे-धीरे राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गईं। स्थानीय प्रशासन और खेल प्राधिकरणों ने उनकी प्रशंसा की है। द्वाराहाट क्षेत्र में उनकी इस सफलता पर खुशी की लहर दौड़ गई है।

ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से उन्हें बधाई दी और भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। गांव के सरपंच ने कहा, “गरिमा हमारी बेटी ने दिखा दिया कि इच्छाशक्ति से कुछ भी असंभव नहीं।”यह उपलब्धि उत्तराखंड के युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश है। राज्य में पैरा स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। सरकार को ऐसे प्रतिभाशालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं, ट्रेनिंग सेंटर और वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए। गरिमा जैसी एथलीट न केवल पदक जीतती हैं, बल्कि समाज को नई दिशा दिखाती हैं। वे साबित करती हैं कि शारीरिक कमी के बावजूद मानसिक ताकत से विश्व पटल पर नाम रोशन किया जा सकता है।गरिमा की सफलता ने पैरा एथलेटिक्स के प्रति जागरूकता भी बढ़ाई है। भारत में पैरा स्पोर्ट्स तेजी से उभर रहा है, और ऐसे आयोजन युवाओं को प्रोत्साहित करते हैं।

गरिमा ने कहा, “मेरा लक्ष्य ओलंपिक स्तर पर भारत के लिए पदक जीतना है।” उनके परिवार और समुदाय का समर्थन उनकी सबसे बड़ी ताकत है। द्वाराहाट से दिल्ली तक का यह सफर निश्चित रूप से कई अन्य बच्चों को प्रेरित करेगा।उत्तराखंड सरकार और खेल मंत्रालय को गरिमा को सम्मानित कर उनके जैसे अन्य एथलीट्स को मौके देने चाहिए। यह न केवल राज्य का गौरव बढ़ाएगा बल्कि पैरा स्पोर्ट्स को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। गरिमा जोशी की कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो चुनौतियों से जूझ रहा है। उनकी जीत हमें सिखाती है – संघर्ष ही सफलता की कुंजी है।
