द्वाराहाट: उत्तराखंड के हरे-भरे वनों को हर साल वनाग्नि का खतरा घेर लेता है। इस खतरे से निपटने के लिए ग्राम पंचायत तकुल्टी में एक महत्वपूर्ण गोष्ठी का आयोजन किया गया। वन क्षेत्राधिकारी गोपाल दत्त जोशी के सशक्त निर्देश पर आयोजित इस कार्यक्रम में विभागीय कर्मचारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि और ग्रामीणों ने एकजुट होकर वनों की सुरक्षा की रणनीति पर विचार-विमर्श किया। यह गोष्ठी न केवल जागरूकता फैलाने वाली थी, बल्कि वन संरक्षण के लिए ठोस संकल्प लेने वाली भी साबित हुई। वन क्षेत्राधिकारी गोपाल दत्त जोशी ने ग्रामीणों को वनों में आग लगने के खतरों और उनसे बचाव के उपायों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि वनाग्नि न केवल पेड़-पौधों को नष्ट करती है, बल्कि जैव विविधता, मिट्टी की उर्वरता और स्थानीय आजीविका को भी चोट पहुंचाती है।
एक छोटी चिंगारी पूरे जंगल को भस्म कर सकती है,जोशी ने चेतावनी देते हुए कहा। उन्होंने आग लगने के प्रमुख कारणों जैसे सिगरेट के टोटे, शॉर्ट सर्किट, लापरवाहीपूर्ण कृषि कार्य और प्राकृतिक कारणों का उल्लेख किया। बचाव के उपायों में उन्होंने वॉच टावर स्थापित करना, नियमित पेट्रोलिंग, आग बुझाने के उपकरणों का रखरखाव और सामुदायिक जागरूकता अभियान चलाने पर जोर दिया। विशेष रूप से आगामी वनाग्नि काल (मार्च से जून) में वन विभाग के साथ सक्रिय सहयोग की अपील की, ताकि कोई हादसा न हो। कार्यक्रम में तकुल्टी की प्रधान मनीषा देवी और क्षेत्र पंचायत सदस्य महेश कुमार की मौजूदगी ने इसे और प्रभावी बना दिया।
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दोनों ने वनों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वन ही हमारी सांसें हैं। इनके संरक्षण से न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, बल्कि वर्षा, जल संरक्षण और वन्यजीवों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी। सभी उपस्थित जनप्रतिनिधियों, ग्रामीणों और विभागीय कर्मचारियों ने वनों के संरक्षण और संवर्धन के लिए सामूहिक संकल्प लिया। यह संकल्प वनाग्नि रोकथाम, अवैध कटाई पर रोक और वृक्षारोपण को बढ़ावा देने का था।विभागीय कर्मचारियों में ललित रौतेला, मनोज कुमार, ठाकुर सिंह, गंगा सिंह, कुबेर सिंह, जितेंद्र सिंह, भोपाल सिंह और बालम सिंह ने सक्रिय भागीदारी निभाई। उन्होंने ग्रामीणों को व्यावहारिक सलाह दी, जैसे आग लगने पर तुरंत सूचना देना, पानी की टंकियों का उपयोग और हवा की दिशा का ध्यान रखना।
कार्यक्रम के अंत में वितरित ब्रोशरों में सुरक्षा टिप्स और हेल्पलाइन नंबर दिए गए, जो ग्रामीणों के लिए उपयोगी साबित होंगे। यह गोष्ठी उत्तराखंड जैसे वन-प्रधान राज्य में एक मिसाल है। यहां तकुल्टी जैसे गांवों से अगर हर जगह ऐसी पहल हो, तो वनाग्नि का कहर रोका जा सकता है। वन विभाग की यह मुहिम ग्रामीणों को सशक्त बनाएगी और हिमालयी पारिस्थितिकी को मजबूत करेगी। आगामी दिनों में ऐसी और गोष्ठियां आयोजित होनी चाहिए, ताकि ‘हरा उत्तराखंड’ का सपना साकार हो। ग्रामीणों का सहयोग ही वनों की असली ढाल बनेगा।
