पंतनगर: उत्तराखंड के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में से एक जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय सोमवार को उस समय स्तब्ध रह गया जब तकनीकी महाविद्यालय के तीसरे वर्ष के छात्र का शव उसके छात्रावास के कमरे में फंदे से लटका मिला। छात्र की पहचान 19 वर्षीय अक्षत सैनी के रूप में हुई, जो सिविल इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष का विद्यार्थी था और रजत जयंती भवन छात्रावास में कमरा संख्या 151 में रह रहा था।
घटनास्थल पर सनसनी
घटना की जानकारी मिलते ही विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस मौके पर पहुंच गई। कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था, जिसे तोड़ने पर छात्र का शव फंदे से लटका मिला। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। प्रारंभिक जांच में घटना को आत्महत्या बताया जा रहा है। मामले की सूचना परिजनों तक पहुंचते ही परिवार में कोहराम मच गया।अक्षत के पिता सागर सैनी रुड़की (हरिद्वार) की संजय गांधी कॉलोनी के निवासी हैं, जो वर्तमान में गाजियाबाद के सेक्टर-23 स्थित न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में अपने परिवार के साथ व्यवसाय करते हैं। परिवार में यह खबर सुनते ही मातम का माहौल छा गया।
सुसाइड नोट में झाँका टूटता मानसिक संतुलन
छात्र के कमरे से एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ है, जिसमें अक्षत ने अपनी मानसिक स्थिति और जीवन की जद्दोजहद का विस्तार से वर्णन किया है। उसने लिखा कि सब कुछ नियंत्रण से बाहर जा रहा है और किसी से अपनी बातें साझा करने पर लोग उसकी भावनाओं को फालतू बातें कहकर टाल देते हैं। उसने लिखा कि वह न तो घर लौटना चाहता है और न ही अब कॉलेज की परिस्थितियों से निपट पा रहा है। अपने पिता की परेशानियों का जिक्र करते हुए अक्षत ने लिखा कि वह उन्हें और चिंता नहीं देना चाहता। सिविल विभाग में आईआर और बैक की समस्याओं का भी उल्लेख किया, जिसे उसने विरासत में मिली परेशानी बताया। सुसाइड नोट के अंत में उसने अपने सलाहकार डॉ. एस.के. कटारिया का आभार व्यक्त किया।
विश्वविद्यालय परिसर में शोक की लहर
घटना की खबर फैलते ही पूरे विश्वविद्यालय परिसर में सन्नाटा पसर गया। साथी छात्रों को यह यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा था कि हमेशा हंसमुख दिखने वाला अक्षत अंदर ही अंदर इतना टूट चुका था। छात्रावास में रहने वाले अन्य छात्रों ने बताया कि अक्षत पिछले कुछ दिनों से चुप-चुप रहता था, लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था कि वह इतना बड़ा कदम उठा लेगा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले में जांच के आदेश दे दिए हैं। कॉलेज प्राचार्य और छात्रावास अधीक्षक ने पुलिस को हर संभव जानकारी दी है। वहीं, मनोवैज्ञानिक सहायता के तौर पर छात्रों के लिए एक काउंसलिंग सत्र आयोजित करने की भी बात सामने आ रही है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।
छात्र जीवन का बढ़ता दबाव
यह दुखद घटना एक बार फिर से उन सवालों को सामने लाती है जो देशभर के तकनीकी और प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक दबाव से जुड़े हैं। लगातार बढ़ते अकादमिक बोझ, प्रतिस्पर्धा, ग्रेड, बैक पेपर और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच आज का युवा कभी-कभी अपने भीतर की परेशानियों को व्यक्त नहीं कर पाता।भारत में हर साल हजारों छात्र मानसिक तनाव और अवसाद के कारण अपनी जान दे देते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट बताती है कि शिक्षा संबंधी दबाव आत्महत्या के प्रमुख कारणों में से एक बन चुका है।
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क्या पर्याप्त है विश्वविद्यालयों की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था?
देश के कई विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर विशेष सेल और हेल्पलाइन शुरू किए गए हैं, लेकिन कई बार छात्र इन सेवाओं का लाभ लेने से हिचकिचाते हैं। या तो उन्हें भरोसा नहीं होता कि उनकी निजी बातें सुरक्षित रहेंगी, या फिर समाज का “कमजोर समझे जाने” का डर उन्हें रोक देता है।जीबी पंत विवि जैसी संस्थाओं में जहां हजारों छात्र पढ़ते हैं, वहां मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग को नियमित रूप से आयोजित किए जाने की जरूरत है। यह केवल एक औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि छात्रों तक पहुंचने वाला वास्तविक सहयोग मंच होना चाहिए।
परिवार और शिक्षकों की भूमिका
अक्षत के सुसाइड नोट से यह स्पष्ट झलकता है कि वह अपने करीबियों से संवाद की कमी महसूस कर रहा था। उसने लिखा कि जब भी वह अपनी दिक्कतें साझा करता, उसे “फालतू बातें” कहकर टाल दिया जाता। यह पंक्ति बेहद चिंताजनक है क्योंकि यह बताती है कि आज के युवाओं को सुना जाना उनकी सबसे बड़ी जरूरत बन गई है।माता-पिता, शिक्षक और मित्र सभी को यह समझने की आवश्यकता है कि किसी छात्र की भावनात्मक परेशानी को गंभीरता से लिया जाए। संवाद की एक खुली स्पेस उन्हें आत्मविश्वास दे सकती है, जो कई बार जीवन रक्षक साबित होती है।
यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है। युवाओं को यह समझाना आवश्यक है कि असफलता जीवन का अंत नहीं है। एक परीक्षा, एक ग्रेड या एक अस्थायी कठिनाई पूरी जिंदगी को परिभाषित नहीं करती।यदि किसी छात्र को मानसिक रूप से असहज महसूस हो, तो उसे तुरंत अपनी बात परिवार, मित्रों या किसी विशेषज्ञ के साथ साझा करनी चाहिए। सरकारी और निजी संस्थाएं मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन चला रही हैं जिन्हें 24 घंटे संपर्क किया जा सकता है। जैसे कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की हेल्पलाइन किरण 1800-599-0019 पर निशुल्क सहायता उपलब्ध है।
सिस्टम को आत्ममंथन की ज़रूरत
अक्षत की आत्महत्या केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि एक संस्थागत असफलता भी है। प्रश्न यही है — क्या शैक्षणिक संस्थान छात्रों की भावनात्मक जरूरतों को समझ पाने में असफल हो रहे हैं? क्या सख्त मूल्यांकन प्रणाली और कमजोर संवाद ने विद्यार्थियों को अवसाद की ओर धकेल दिया है?जरूरत इस बात की है कि विश्वविद्यालयों में मेंटल हेल्थ एजुकेशन को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। छात्रों के बीच सहयोग की संस्कृति विकसित की जाए, जहां वे एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें।
