पौड़ी: मध्य हिमालय की गोद में बसे हरे-भरे जंगल, चहचहाते पक्षी और बहते झरने अब खतरे की घंटी बजा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन का असर यहां साफ नजर आ रहा है। कम हो रहा हिमपात, बदलते बारिश के पैटर्न और मानवीय हस्तक्षेप ने इस क्षेत्र की जैव-विविधता को गंभीर संकट में डाल दिया है। गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर के पर्यावरण विशेषज्ञों ने एक महत्वपूर्ण शोध किया है, जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोडायवर्सिटी साइंस, ईकोसिस्टम सर्विसेस एंड मैनेजमेंट में प्रकाशित हुआ। यह अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन से वनस्पतियों की संरचना, जल स्रोतों की स्थिति और वन्यजीवों के व्यवहार में तेजी से बदलाव हो रहे हैं।हिमालयी क्षेत्र में हिमपात की मात्रा में 20-30 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और नदियां सूखने लगी हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, औसत तापमान में 1-2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि ने पेड़-पौधों के विकास चक्र को बिगाड़ दिया है।
उदाहरण के लिए, उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अल्पाइन घास के मैदान सिकुड़ रहे हैं, जबकि निचले इलाकों में आक्रामक प्रजातियां फैल रही हैं। इससे औषधीय पौधे जैसे अश्वगंधा, तुलसी और ब्राह्मी खतरे में हैं, जो स्थानीय समुदायों की आजीविका का आधार हैं। जल स्रोतों पर भी असर पड़ा है—प्राकृतिक झरने सूख रहे हैं, जिससे ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है।वन्यजीवों का व्यवहार भी बदल गया है। हिमालयी काला भालू और तिब्बती लंगूर जैसे जीव ऊंचाई की ओर खिसक रहे हैं, लेकिन वहां ऑक्सीजन की कमी और भोजन की तंगी उन्हें परेशान कर रही है। पक्षियों के प्रवास पैटर्न बिगड़ गए हैं, जिससे परागण प्रभावित हो रहा है।
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मानवीय हस्तक्षेप ने मुसीबत को और बढ़ा दिया। वनों की कटाई, अवैध खनन और पर्यटन का अंधाधुंध विकास ने पारिस्थितिकी को चोट पहुंचाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यही सिलसिला चला तो मध्य हिमालय की पारिस्थितिक स्थिरता ध्वस्त हो जाएगी, और इससे जुड़े करोड़ों लोगों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।इस संकट से निपटने के लिए विशेषज्ञ सामुदायिक भागीदारी पर जोर दे रहे हैं। स्थानीय ग्राम सभाओं को सक्रिय कर जल स्रोतों का संरक्षण किया जाए। औषधीय पौधों का वैज्ञानिक प्रबंधन आवश्यक है—जैसे इनकी खेती को बढ़ावा देकर जंगलों पर दबाव कम करना। विकास नीतियों को नए सिरे से लिखना होगा, जिसमें जलवायु-अनुकूल कृषि, वनीकरण अभियान और सतत पर्यटन शामिल हों।
सरकार को नीतिगत स्तर पर फंडिंग बढ़ानी चाहिए, जबकि एनजीओ और वैज्ञानिक संस्थान जागरूकता अभियान चलाएं। उदाहरणस्वरूप, उत्तराखंड में चल रहे ‘हिमालय संरक्षण मिशन’ को मजबूत बनाया जाए।समय रहते ठोस कदम न उठाए गए तो मध्य हिमालय का भविष्य अंधेरे में डूब सकता है। यह न केवल पर्यावरण का संकट है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर और आर्थिक स्थिरता का भी सवाल है। आइए, हम सब मिलकर इस हिमालयी विरासत को बचाएं—क्योंकि यह हमारा घर है, हमारी पहचान है।
