रुद्रप्रयाग: गंगोत्री धाम, चारधाम यात्रा का एक प्रमुख तीर्थस्थल, इन दिनों एक बड़े विवाद के केंद्र में है। उत्तराखंड के गंगोत्री ग्लेशियर के स्रोत पर स्थित यह पवित्र स्थल भगवान शिव की तपोभूमि माना जाता है। यहां गंगा नदी का उद्गम होता है, जो हिंदू धर्मावलंबियों के लिए मोक्षदायिनी है। लेकिन मंदिर समिति के हालिया फैसले ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। समिति ने गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है, जिसे धार्मिक पवित्रता की रक्षा का हवाला देकर लिया गया। क्या यह परंपराओं का सम्मान है या संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन? आइए इस मुद्दे को विस्तार से समझें।
समिति ने स्पष्ट किया है कि यह नियम सभी संबंधित मंदिरों पर समान रूप से लागू होगा. बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने इस फैसले की पुष्टि करते हुए बताया कि केवल हिंदू श्रद्धालुओं को ही इन मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी. उन्होंने कहा कि इस संबंध में एक प्रस्ताव आगामी बोर्ड बैठक में पारित किया जाएगा, जिसके बाद इसे औपचारिक रूप से लागू कर दिया जाएगा.
क्यों लिया गया ये फैसला?
बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के सबसे प्राचीन और पवित्र धार्मिक स्थलों में गिने जाते हैं. ये दोनों मंदिर चार धाम यात्रा का अहम हिस्सा हैं और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. समिति का मानना है कि मंदिरों की परंपराओं और धार्मिक मर्यादाओं की रक्षा के लिए यह फैसला जरूरी है। यह विवाद नया नहीं है। पिछले वर्षों में केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे धामों में भी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर बहस हुई थी।
सोशल मीडिया पर कई लोग समिति के पक्ष में उतरे हैं। एक ट्विटर यूजर ने लिखा, हिंदू तीर्थों की पवित्रता बचानी है। सबको घुसने दो तो मंदिर ही क्या रह जाएगा? वहीं, विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन इसे भेदभावपूर्ण बता रहे हैं। कांग्रेस नेता हरीश रावत ने कहा, भारत का संविधान सभी को धार्मिक स्थलों पर जाने का अधिकार देता है। यह फैसला अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी विरोध जताया, दावा किया कि यह धार्मिक असहिष्णुता को बढ़ावा देता है।
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विवाद की जड़ें गहरी हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी है, लेकिन इसमें धार्मिक संस्थानों को अपनी परंपराओं को बनाए रखने का अधिकार भी दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में स्पष्ट किया गया कि मंदिर प्रबंधन समितियां प्रवेश नियम बना सकती हैं, बशर्ते वे भेदभावपूर्ण न हों। पद्मनाभस्वामी मंदिर मामले में कोर्ट ने कहा था कि प्राचीन परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन सबरीमाला मंदिर विवाद ने दिखाया कि लैंगिक भेदभाव असंवैधानिक है। गंगोत्री मामले में सवाल यह है कि क्या धर्म के आधार पर प्रतिबंध वैध है?
कब खुलेंगें बद्रीनाथ धाम के कपाट?
इसी बीच बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तारीख भी घोषित कर दी गई है. छह महीने के शीतकालीन अवकाश के बाद बद्रीनाथ मंदिर के कपाट 23 अप्रैल को श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे. मंदिर अधिकारियों के अनुसार कपाट खुलने की शुभ तिथि और समय का निर्धारण नरेंद्र नगर स्थित टिहरी राजमहल में पारंपरिक पूजा और विधि विधान के बाद किया गया.
कब होगी चार धाम यात्रा 2026 की औपचारिक शुरुआत?
केदारनाथ धाम के साथ साथ छोटा चार धाम यात्रा में शामिल गंगोत्री और यमुनोत्री मंदिरों के कपाट भी खुलने वाले हैं. गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतीया के अवसर पर यानी 19 अप्रैल को खोले जाएंगे. इसके साथ ही उत्तराखंड में चार धाम यात्रा 2026 की औपचारिक शुरुआत हो जाएगी.
मंदिर समिति के इस फैसले के पीछे क्या है वजह?
मंदिर समिति के इस फैसले को लेकर धार्मिक और सामाजिक स्तर पर चर्चाएं तेज हो गई हैं. कुछ लोग इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा कदम बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे संवैधानिक मूल्यों के नजरिये से देख रहे हैं. हालांकि समिति का कहना है कि यह निर्णय किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि परंपराओं के संरक्षण के लिए लिया गया है. अब सभी की नजरें मंदिर समिति की बोर्ड बैठक पर टिकी हैं, जहां इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लगेगी.
