नंदा देवी राजजात यात्रा 2027: नंदा देवी राजजात, उत्तराखंड की सबसे कठिन और लंबी पैदल धार्मिक यात्रा को लेकर बड़ा फैसला आ गया है। वर्ष 2026 में प्रस्तावित यह पवित्र यात्रा अब स्थगित कर दी गई है। नंदा देवी राजजात यात्रा समिति ने स्पष्ट किया है कि यह ऐतिहासिक यात्रा अब 2027 में आयोजित होगी। अंतिम औपचारिक घोषणा 23 जनवरी को मनौती कार्यक्रम के दौरान की जाएगी। “हिमालय का महाकुंभ” के नाम से मशहूर यह यात्रा हर 12 वर्ष में निकलती है, जो भक्तों के लिए आस्था और साहस की पराकाष्ठा है।नंदा देवी राजजात उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का अनमोल रत्न है। यह यात्रा नंदा देवी को समर्पित है, जो हिमालय की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। हर 12 साल में आयोजित होने वाली यह यात्रा Almora, Chamoli और Pithoragarh जिलों के दुर्गम हिमालयी इलाकों से गुजरती है। यात्रा का प्रारंभिक बिंदु Almora के Martoli गांव से होता है, जहां से नंदा देवी की पालकी (राजजात) को देवी के स्वयंभू मंदिर नंदा देवी राज तक ले जाया जाता है।
यह यात्रा करीब 9 दिनों की होती है, जिसमें 300 किलोमीटर से अधिक की पैदल दूरी तय की जाती है। ऊंचाई 5,000 मीटर से अधिक वाले क्षेत्रों में भारी सामान ढोते हुए हजारों भक्त शामिल होते हैं।यह यात्रा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। स्थानीय गढ़वाल-कुमाऊं की जनजातियां जैसे भोटिया, शौका और मार्का इसकी मुख्य संरक्षक हैं। यात्रा में पारंपरिक वाद्ययंत्रों जैसे रणसिंग, ढोल-दमाऊं के साथ लोकगीत गाए जाते हैं। UNESCO ने इसे इंटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज के रूप में मान्यता दी है। पिछली राजजात 2014 में हुई थी, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल हुए थे। अब 2026 की यात्रा स्थगित होने से भक्तों में निराशा है, लेकिन सुरक्षा को प्राथमिकता देने का निर्णय सराहनीय है।
यात्रा स्थगित करने की प्रमुख वजहें
नंदा देवी राजजात यात्रा समिति के अध्यक्ष राकेश कुंवर ने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में यात्रा से जुड़े कई आवश्यक कार्य समय पर पूरे नहीं हो पाए। इसमें रास्तों का निर्माण, पुलों की मरम्मत और सुरक्षा उपाय शामिल हैं। सबसे बड़ी समस्या मौसम से जुड़ी है। 2026 में निर्धारित तिथियों के अनुसार यात्रा सितंबर माह में उच्च हिमालयी इलाकों जैसे Roopkund, Bedni Bugyal और Nanda Devi Raj तक पहुंचती। इस समय भारी बर्फबारी, हिमस्खलन और खराब मौसम की आशंका रहती है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय में मौसम चक्र अनियमित हो गया है, जो यात्रा को जोखिमपूर्ण बना देता। राकेश कुंवर ने कहा, भक्तों की सुरक्षा सबसे ऊपर है। आधी-अधूरी तैयारी से यात्रा में हादसे हो सकते थे। 2027 में सब कुछ पूर्ण रूप से तैयार होगा। समिति ने वैकल्पिक रूप से 2027 की यात्रा को अधिक भव्य बनाने की योजना बनाई है। इसमें डिजिटल ट्रैकिंग, हेलीकॉप्टर सहायता और पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी का पैटर्न बदल रहा है, जिससे सितंबर में ही ऊंचाई वाले रास्ते बंद हो जाते हैं। 2014 की यात्रा में भी मौसम ने चुनौतियां पैदा की थीं, लेकिन तब तैयारी बेहतर थी।
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स्थानीय प्रभाव और भविष्य की तैयारियां
यह निर्णय अल्मोड़ा, द्वाराहाट और आसपास के गांवों पर असर डालेगा। स्थानीय अर्थव्यवस्था, जो यात्रा से पर्यटन और व्यापार पर निर्भर है, को झटका लगेगा। हालांकि, समिति ने आश्वासन दिया है कि 2027 में यात्रा को और विस्तृत बनाया जाएगा। मनौती कार्यक्रम 23 जनवरी को Martoli में होगा, जहां हजारों भक्त जुटेंगे। यह कार्यक्रम यात्रा का प्रतीकात्मक आरंभ माना जाता है।उत्तराखंड सरकार ने भी इस निर्णय का समर्थन किया है। पर्यटन मंत्री ने कहा कि सुरक्षा प्रोटोकॉल के बिना ऐसी यात्रा संभव नहीं।
पर्यावरणविदों का मानना है कि स्थगन से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को राहत मिलेगी। यात्रा के दौरान प्लास्टिक मुक्त अभियान चलाया जाता है, जो जलवायु संरक्षण में योगदान देता है। भक्तों से अपील है कि वे धैर्य रखें और 2027 की राजजात में बढ़-चढ़कर भाग लें।नंदा देवी राजजात केवल यात्रा नहीं, बल्कि हिमालयी संस्कृति का जीवंत प्रमाण है। यह स्थगन भले ही असुविधाजनक हो, लेकिन दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है। 2027 में जब पालकी फिर निकलेगी, तो आस्था का सैलाब और मजबूत होगा।
